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Wednesday, 8 April 2026

भारत: विश्व गुरु की वास्तविक परिभाषा

 

​भारत: विश्व गुरु की वास्तविक परिभाषा


Pic By GEMINI AI 

​भारत के 'विश्व गुरु' वाली पदवी की खिल्ली उड़ाने से पहले भारत क्यों विश्व गुरु है, इसे समझना होगा।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

​गुरु का अर्थ होता है—अंधकार से निकालकर प्रकाश की राह पर ले जाने वाला। दूसरे शब्दों में समझें तो, जो असंयमित हैं, नासमझ हैं, अपनी मंजिल से भटक गए हैं, ऐसों को राह दिखाने वाला।

​उसी प्रकार 'विश्व गुरु' का अर्थ हुआ—पूरे जग को अंधकार से निकालकर प्रकाश की राह पर ले जाने वाला। विश्व गुरु का यह मतलब नहीं है कि भागदौड़ करके उनके बीच समझौता करवाए; गुरु इन झमेलों में नहीं फँसता है। वह जब भी मिलेगा, उन्हें एक ही तराजू में तौलकर उनकी कमियों को गिनाने की जगह, उन्हें सुलझाने के लिए कहेगा।

​समझौता गुरु कभी नहीं करवाते हैं और अगर वे करवाते हैं, तो वे गुरु नहीं हैं। समझौते में हमेशा 'फायदा और नफा' देखा जाता है और गुरु जो ज्ञान देता है, उसमें सिर्फ 'फायदे' (परम हित) को ही देखा जाता है। और सभी को पता है, फायदा कौन देखता है!

​इसलिए, जो भी सोचता है कि भारत खुद को विश्व गुरु कहलवाता है और जब विश्व में लफड़े शुरू होते हैं तो वह उसमें नहीं पड़ता है—जबकि पूरा विश्व उसकी तरफ देखता रहता है—तो उनके लिए इतना है कि भारतवर्ष सदियों से कहता चला आया है कि: "युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है।" और उसका उदाहरण देख सकते हो; भारत पर अनगिनत हमले हुए, फिर भी वह वहीं खड़ा हुआ है, और देश पता नहीं कितनी बार बदल गए।

​तो जिन्हें अब भी लगता है कि भारत विश्व गुरु होकर भी कुछ नहीं करता है, तो सबसे पहले उन्हें 'भारत के लोग क्या कह रहे हैं' उसकी जगह भारत को पढ़ना चाहिए। गुरु किसे कहते हैं, इसे पढ़ना चाहिए। अगर तब भी कुछ समझ में न आए या कुछ भी न मिले, तो खुद को ही किसी अच्छे गुरु के पास ले जाकर समर्पित कर देना चाहिए। क्योंकि जब तक खुद को समर्पित नहीं करोगे, तब तक न खुद को समझ पाओगे और न ही भारत और उसकी गुरु परंपरा को।

​तो विश्व गुरु की खामियाँ गिनने और गिनाने की जगह उसे समझने, उससे सीखने का प्रयास कीजिए। विश्व को सुखमय करे या न करे, लेकिन यह आपके जीवन को संवार कर सुखमय ज़रूर कर देगा।

"समझौते में हमेशा फायदा और नफा देखा जाता है और गुरु जो ज्ञान देता है, उसमें सिर्फ फायदे (परम हित) को ही देखा जाता है।"

–अजय नायक ‘वशिष्ठ'

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