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Sunday, 5 April 2026

दहेज़ - असाक्षरता से होते हुए साक्षर वर्ग को लपेट लिया एक भयावह नासूर

दहेज़ - असाक्षरता से होते हुए साक्षर वर्ग को लपेट लिया एक भयावह नासूर 

PIC BY GOOGLE GEMINI 



क्या   पढ़ा–लिखा,  क्या   करिया   अक्षर   भैंस,
सबकी  एक  ही  दुर्गति,  सबकी एक ही हवस।
सब  अपने–अपने  हिसाब  से  जाल  फेंकते  हैं,
जो भी फँसा, उसे उसी ढिठाई से समेट लेते हैं।
—अजय नायक ‘वशिष्ठ’


उपरोक्त विचारों को सिद्ध करती दहेज़ से सम्बंधित खबरें जब भी पढ़ते हैं या सामने आती हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दहेज एक  ऐसा अभिशाप बन गया है जो  न जाने कितने परिवारों को निगल चुका है और आगे कितने परिवारों को निगलता रहेगा। यहाँ 'परिवार' शब्द का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि जब भी दहेज़ से संबंधित कोई भी त्रासदी होती है तो एक व्यक्ति नहीं, पूरा परिवार इसकी जद में आ जाता है।


पहले यह माना जाता था कि लोग पढ़े लिखे नहीं है इसलिए दहेज की माँग करते हैं और मनमुताबिक दहेज़ न मिलने पर कुछ भी कर देते हैं। अमानवीयता जैसे हरकते कर जाते हैं। उस समय के लोगों के अन्दर एक उम्मीद थी कि जैसे-जैसे साक्षरता दर बढ़ेगी, लोग खुद ही जागरूक होकर इसके खिलाफ हो जाएंगे। और इस कलंक का अंत हो जायेगा। लेकिन हाल ही में समाचार पत्रों में दहेज़ से सम्बंधित  विभिन्न स्थानों की ख़बरों को पढ़कर लगा कि यह अब पहले से भयावह हो गया है। और इसमें  सबसे बड़ी गौर करने वाली ये बात थी ज्यादातर ख़बरें शहरों से थी। वो भी देश के सबसे बड़े शहरों से थी। यानि यह समस्या अब पहले से कहीं अधिक 'भयावह' रूप ले चुकी है। 


'भयावह' आपको लग रहा होगा ये शब्द क्यों जोड़ रहे हैं। ये शब्द इसलिए जोड़ रहे हैं कि घटनाएं कम तो हुई है लेकिन इसने अपने जद में उन उच्च-शिक्षित पढ़े-लिखे लोगों को ले लिया है जो सिर्फ पढ़ाई में ही आगे नहीं है, बल्कि आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर हैं। अब अगर इस प्रकार के सक्षम वर्ग में से कोई घटना घटकर बाहर आती हो तो उस घटना को एक अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। बल्कि उसे 'भयावह' घटना की श्रेणी में रखना ही सबसे ज्यादा मुनासिब होगा। क्योंकि यह स्थिति एक सामान्य अपराध की श्रेणी में बिलकुल नहीं आएगी। यहाँ वह व्यक्ति शामिल है जिसे पता है कि वह क्या कर रहा है। घटना के बाद क्या-क्या होने वाला है?


हमें अन्दर तक एक गहराई तक इस पर सोच-विचार करना होगा कि यह घटनाएं क्यों घट रही है? क्योंकि आज लगभग सबके पास बुनियादी संसाधन उपलब्ध है, और मेहनत के बल पर अपनी स्थिति भी बदल रहा है। यह जानते हुए कि अपनी मेहनत से सबकुछ बदला जा सकता है फिर भी यदि लालच की भूख अगर शांत नहीं हो रही, तो इसके मूल कारणों तक जाना हर किसी के लिए जरुरी है। क्योंकि इसे अगर अब भी पहले वालों की तरह "लोग साक्षर हो जायेंगे तो यह नासूर अपने आप ख़त्म हो जायेगा" वाले  भरोसे पर छोड़ेंगे तो ये हमेशा के लिए एक ऐसा स्थायी नासूर बन जाएगा, जब भी उसे मौका मिलेगा किसी न किसी परिवार को तबाह करता रहेगा। 


दहेज़ जैसी कुप्रथाओं को अगर सचमुच में खत्म करना है तो "साक्षरता के साथ-साथ संस्कार, सामाजिक जागरूकता और एक अत्यंत सख्त कानून की जरूरत है।" उससे पहले हमें अपनी 'प्रदर्शन संस्कृति' को एकदम से खत्म करना होगा। जब हम दूसरों को यह बड़े शान से बतलाते हैं कि "हमें ये–ये चीजें शादी में या फला-फला कार्यक्रम में लड़की वालों की तरफ से मिला है," तो कहीं न कहीं हम जाने-अनजाने में दूसरों के भीतर भी उस लालच की तरफ जाने के लिए प्रेरित करते हैं कि "जितने के भी हम काबिल थे कम से कम उतना तो हमें भी मिलना ही चाहिए था।" 


"और जब इस प्रकार की अपेक्षाएं पूर्ण नहीं होती है, तो किसी न किसी बहाने वह उस घर के नए सदस्य (बहु) पर निकलने लगता है, जो अभी-अभी परिवार का हिस्सा बना है। जिसका इस नए परिवेश में फिलहाल में अपना कोई नहीं है और जो केवल अपने अच्छे व्यवहार से अपने उस नए परिवार के लोगों से अच्छा संबंध बनाने का प्रयास करता रहता है।"


ये चीजें तब और भी ज्यादा होने लगती है, जब हम अपने घर के किसी सदस्य को वर्तमान में अपने समर्थ्य और माँग से भी बहुत ज्यादा देकर विदा किये होते हैं, तब समाज में दूसरों से भी उसी प्रकार से मिलने की संभावनाएँ और आकांक्षाएं अनैतिक रूप से बढ़ जाती हैं। 


इसे ख़त्म करने के लिए हमें सिर्फ एक तरफ़ा ही नहीं देखना होगा। अगर इसे सचमुच में ख़त्म करना है, तो दूसरी तरफ को भी बड़े ही ध्यान से देखना होगा। क्योंकि इसके शुरुआत से ही देखा गया है की, इसे एक ब्रम्हास्त्र हथियार के रूप में भी कुछ लोगों के द्वारा उसी कानून के छाये में रहकर उपयोग किया गया है। तो समाज को इसे ख़त्म करने के लिए दूसरे पहलू को भी ध्यान में रखना होगा की कहीं कोई इसका गैर फायदा न उठा पाए।  


लालच का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है; यह मानवीय कमजोरियों के साथ कब और किस रूप में खड़ा हो जाएगा पता नहीं। इसे एक बार में ख़त्म भी नहीं कर सकते हैं;  लेकिन यदि हम हर समय जागरूक रहें, समय-समय पर लोगों से इस पर निरंतर चर्चा करते रहें और लोगों को जागरूक करके ऐसे अवयवों से दूर रहने के लिए समाज के साथ-साथ उस युवा वर्ग को प्रेरित करने के साथ, ऐसे लोगों का पूर्ण रूप से बहिष्कार करते रहें, तो शायद बहुत जल्दी ये नासूर जड़ से खत्म हो जाए। 


"बस शर्त इतना  ही है पहल हर किसी को करनी होगी। पहले वो, पहले वो वाली हठ हर किसी को छोडनी होगी। चाहे तात्कालिक फायदे मिले या न मिले। एक सुनहरे भविष्य के लिए हर किसी को आगे बढ़ना ही होगा।"

–अजय नायक ‘वशिष्ठ’

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