हर दिन, हर दिन की तरह नहीं होता है...........
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| GOOGLE GEMINI AI |
कुछ महिने पहले हरियाणा से एक खबर प्रकाशित हुयी थी। 500₹ शर्त में जीतने के चक्कर में बागपत का एक व्यक्ति यमुना नदी में कूद गया। सोचा होगा रोज तो इसे चुटकी में पार कर लेता हूं तो आज भी पार कर ही लूंगा! ये तो अब मेरे बाएं हाथ का खेल है! लेकिन वह यह भूल गया था कि कल का 'रोज', आज के 'रोज' की तरह नहीं रहता है। उसमें हर समय, कुछ न कुछ बदलाव तो होता ही है। कल और आज का छोड़िए अभी का क्षण, आने वाले क्षण के समान नहीं होता है, तो रोज का रोज कैसे रोज के रोज समान होगा।
ठीक वैसे ही सोचने वाली बात है कि एक नदी भी हर दिन के समान कैसे हो सकती है? कैसे वह हर रोज के समान बह सकती है? कैसे वह हर रोज के समान दिख सकती है? कुछ न कुछ तो बदलाव हुआ होगा ही। शायद उनमें से कुछ को बदलाव दिखा भी होगा। ऐसा हो नहीं सकता है कि रोज कूदने वाले को नदी के बहाव में थोड़ा भी बदलाव दिखा ही नहीं होगा। नदी में कूदने का छोड़िए अगर वह हर रोज नदी के पास भी जाता भी होगा तो भी वह नदी में हर क्षण हो रहे बदलाव को महसूस भी करेगा और पकड़ भी लेगा और ये तो नदी में छलांग लगाने वाले थे। नदी के रूप में बदलाव होता हुआ इन्हें भी दिखा ही होगा लेकिन 500₹ की शर्त और अति-आत्मविश्वास ने इनके आँखों पर काले चश्मे का पर्दा लगा दिया होगा। और उस दिन के बदलाव को पकड़ नहीं पाए होंगे और कूद पड़े होंगे 500₹ शर्त को जीतने के लिए यमुना जी में। फिर वही हुआ जिसका अंदाजा वहां उपस्थित सभी लोगों को भी थोड़ा बहुत तो रहा ही होगा और नहीं भी रहा होगा। उफनती नदी में कूदना है और उसके जोर का थोड़ा भी एहसास न हो तो फिर वो या तो मूर्ख होगा या कोई सूरदास के साथ-साथ कर्णबधिर भी होगा।
कुछ भी हुआ होगा लेकिन परिणाम यही निकला कि वह व्यक्ति 500₹ के लिए नदी में डूबकर या बहकर मर गया। वह व्यक्ति भले नदी में डूबकर या बहकर मरा लेकिन उसे ऐसा न बोलकर ऐसे बोलेंगे कि “वह व्यक्ति 500₹ में डूबकर या बहकर मर गया।” आखिर कूदा तो था 500₹ के लिए ही ना तो यही उपमा उसके लिए ठीक भी होगी। “वह व्यक्ति 500₹ में डूबकर या बहकर मर गया।”
खैर जो भी हुआ वह किसी मायने में अच्छा नहीं हुआ। इतिहास के पन्ने पलटते हैं तो ऐसी बहुत सी घटनाएं सामने आती है कि बहुतों ने उफनते समुद्र से लड़कर खुद को जिंदा रखा। फिर एक उफनती नदी की क्या बिसात जो किसी को उसे पार करने से रोक पाए। बात यहां यह है कि दोनों ज्यादा फर्क नहीं है लेकिन एक फर्क साफ है कि उन्होंने उफनती नदियों को या उफनते समुद्र से लड़ने की तब सोचा जब उनके पास लड़ने के सिवा कोई और चारा नहीं था। उन्हें उनसे लड़ना ही था तभी वे बच सकते थे और जिसका परिणाम बहुतों को मिला भी और बहुतों को नहीं भी मिला । बात यही है कि उनके सामने एक मजबूरी थी जहां पर उन्हें या तो लड़कर मरना था या खुद को उसके हवाले करके मरना था। तो कुछ ने हिम्मत दिखाई और लड़ गए। जिसका रिजल्ट पहले से ही शून्य था लेकिन उनमें से भी कुछ ने उसे गलत सिद्ध करके सौ प्रतिशत रिजल्ट प्राप्त किया और कुछ ने...... ।
500₹ वाले व्यक्ति के सामने ऐसा कुछ नहीं था। यहां एक सामान्य सी शर्त थी 500₹ जीतना । जहां कोई भी मजबूरी नहीं थी। यह एक दुस्साहस था। 500₹ मिलते ही उस जीते हुए रुपयों से पार्टी होती, मौज मस्ती होती और दूसरों पर रौब दिखाया जाता कि मैंने इतनी बड़ी पहलवानी वाली कार्य किया। मेरी इज्जत करो। सम्मान दो मुझे बस यही। और हमने उसका परिणाम देख लिया। आज वह इस दुनिया में नहीं है।
बस लोगों को यही बात समझनी है कि हर दिन का दिन हर रोज की तरह नहीं होता है। इसलिए अपनी तैयारी को कभी पूर्ण न समझिए। हर रोज सीखते रहिए और सीखने के बाद परिणाम भले अपने पक्ष में मिले उसके अगले दिन के लिए अगर कोई कुछ सीखने के लिए कहता है तो उसके लिए भी बिना किसी आनाकानी के तैयार रहिए।
“आपकी सफलता आपके विद्यार्थी बनकर ग्रहण करने में ही है।”
–अजय नायक ‘वशिष्ठ’

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