कुछ कहते क्यों नहीं
अरे! जो बोलते हैं वो सुनते भी हो?
या बस अपनी ही सुनाने आये हो?
और न सुनने पर तुरंत बोल पड़ते हो—
कुछ कहते क्यों नहीं !
कहते–बोलते ही तो यहाँ तक पहुँचा हूँ,
कभी किसी ने गौर किया है?
गौर को छोडो तनिक भी ध्यान दिया है?
किसी ने कुछ नहीं कहा,
तो तुरंत सब बोल पड़ते हैं,
कुछ कहते क्यों नहीं!
क्या जरुरी है?
हर सवाल पर कुछ न कुछ बोला ही जाये ?
मूड़ नहीं हो सकता है,
जरुरी थोड़े ना है,
हर सवाल हर किसी को आता ही हो!
बहुत कुछ हो सकता है,
शायद आपके सोच से परे हो सकता है,
और बिना बोले ही जवाब हो सकता है!
कुछ कहते क्यों नहीं—
बोलने से पहले एक बार जरूर सोचना,
उत्तर हर किसी का होता है,
जवाब न बोलने का ढूँढना पड़ता है!
–अजय नायक ‘वशिष्ठ’

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